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मुस्लिम परिवार बनाते हैं कांवड़

मनोज पाठक, पटना, 18 अगस्त : एक ओर जहां लोग संप्रदाय के नाम पर आपस में बंटे नजर आते हैं वहीं बैद्यनाथधाम जाने वाले हिंदुओं के कांवड़ों का निर्माण मुस्लिम परिवार द्वारा किया जाता है।


झारखंड के देवघर जिला स्थित विश्व प्रसिद्ध बैद्यनाथधाम में हर वर्ष करोड़ों श्रद्धालु सुल्तानगंज के गंगा नदी से जल भरकर कांवड़ लेकर जाते हैं। कांवड़ निर्माण करने वाले मुस्लिम परिवारों का यह कोई नया पेशा नहीं है, बल्कि यह कारीगरी खानदानी पेशा है।

भागलपुर जिले के सुल्तानगंज स्थित उत्तरवाहिनी गंगा से कांवड़िए जल भरकर वैद्यनाथधाम की यात्रा शुरू करते हैं। यहां से करीब 108 किलोमीटर की दूरी पैदल ही तय कर श्रद्धालु बाबा के दरबार तक पहुंचते हैं।

सुल्तानगंज से यात्रा शुरू होने के कारण यहीं कांवड़ की सबसे अधिक बिक्री होती है। सुल्तानगंज में कांवड़ बनाने वाले करीब 25 से 30 मुस्लिम परिवार हैं। यही इन परिवारों का मुख्य पेशा है।

कांवड़ निर्माण से जुड़े मोहम्मद कलीम ने बताया कि उनके पिताजी और दादा भी यही काम किया करते थे। कांवड़ बनाकर परिवार चलाने वाले कलीम ने बताया कि सावन की तैयारी में वे लोग दो से तीन महीने पहले ही जुट जाते हैं। उन्होंने कहा कि अपने पिता से कला सिखी थी। कांवड़ बनाने के दौरान शुद्धता का पूरा ख्याल रखा जाता है।

एक अन्य कारीगर अजहरुद्दीन ने बताया कि आम तौर पर कांवड़ निर्माण में बांस, मखमली कपड़े, घंटी, सीप की मूर्ति, प्लास्टिक का सांप का प्रयोग किया जाता है परंतु कई महंगे कांवड़ों का निर्माण होता है जिसमें कई कीमती सामग्रियां भी लगाई जाती हैं। वे कहते हैं कि सावन में यहां प्रतिदिन करीब एक लाख कांवड़ की बिक्री होती है। यहां के मुस्लिम परिवारों में कई परिवार थोक भाव में भी कांवड़ की बिक्री करते हैं।

कांवड़ बनाने वाले एक अन्य कारीगर महताब ने बताया कि कांवड़ों का व्यापार सावन और भादो महीने में जमकर चलता है। वे कहते हैं कि इसी दो माह की कमाई से वर्षभर गुजारा चलता है। उन्होंने बताया कि कई बेरोजगार लोग सावन में यहां के बने कांवड़ खरीदकर कांवड़ बेचने की दुकान खोल लेते हैं और उसे कुछ अधिक पैसा लेकर बेचते हैं।

उन्होंने बताया कि कांवड़ के निर्माण में प्रयुक्त होने वाली वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि के कारण कांवड़ों के भी मूल्य में वृद्धि हुई है। उन्होंने बताया कि बाजार में 300 रुपये से लेकर 1000 रुपये या इससे भी महंगे कांवड़ उपलब्ध हैं।

आमतौर पर श्रद्धालु प्रत्येक वर्ष कांवड़ नहीं बदलते हैं।

वे कहते हैं कि यहां के मुस्लिम युवक ऐसे भी कांवड़ियों की सुविधा देने में कोई कमी नहीं रखते। इस दौरान वे शुद्धता का पूरा ध्यान रखते हैं। उन्होंने बताया कि यह अब यहां के लोगों के लिए व्यापार नहीं परंपरा बन गई है।

--IANS

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